111 साल की रामलीला: महेवा कला में पीढ़ियां बदलीं, लेकिन नहीं टूटी अभिनय की परंपरा

कभी दफ्ती के मुकुट और लालटेन की रोशनी में होता था मंचन, अब रेशमी पर्दों से सजे रंगमंच पर उतरते हैं रामायण के प्रसंग; सेवानिवृत्त अधिकारियों, कर्मचारियों और युवाओं की भी है भागीदारी

मानस न्यूज 24- महेवा कला रामलीला में मंचन करते कलाकार 

मांडा, प्रयागराज। कलाकार के संवाद में चूक हुई तो शृंगार कक्ष में पहुंचते ही फटकार मिलती थी। पात्रों को संवाद याद कराने के लिए महीनों पहले से अभ्यास कराया जाता था। नागपंचमी बीतते ही तैयारियों का सिलसिला शुरू हो जाता था। महेवा कला की रामलीला से जुड़ी ये यादें आज भी इसके पुराने कर्णधारों के जेहन में ताजा हैं। करीब 110 वर्षों की इस यात्रा में कई पीढ़ियां बदल गईं, लेकिन रामायण के प्रसंगों को मंच पर जीवंत करने का सिलसिला नहीं थमा।

रामलीला के 85 वर्षीय पूर्व निदेशक श्रीकांत पांडेय और 80 वर्षीय पूर्व निदेशक अवधनारायण मिश्र, दोनों सेवानिवृत्त शिक्षक हैं। उन्होंने पुराने दिनों को याद करते हुए बताया कि उस समय कलाकारों को तैयार करने और संवादों का अभ्यास कराने पर विशेष जोर दिया जाता था। मंचन को गंभीरता से लिया जाता था और कलाकारों से अपने पात्र के अनुरूप अभिनय की अपेक्षा रहती थी।

तीन अक्तूबर 1916 को हुआ था पहला मंचन

महेवा कला में रामलीला की शुरुआत आजादी से पहले हुई थी। तीन अक्तूबर 1916, मंगलवार को गांव में पहली बार नककटैया का मंचन किया गया। इसकी प्रेरणा नवरात्र में मांडा राजमहल परिसर में होने वाली रामलीला से मिली थी। करीब 10 किलोमीटर दूर वहां का आयोजन देखने गए ग्रामीणों ने भक्ति प्रसंगों को नाट्य रूप में प्रस्तुत करने की परंपरा अपने गांव में शुरू की।

इस आयोजन को स्थापित करने और सतत गतिशीलता प्रदान करने में बृजकिशोर, जनक किशोर, ठाकुर प्रसाद श्रीवास्तव, महावीर प्रसाद कुल्लू, राजनारायण, हरिश्चंद्र, शिवधारी मिश्र, अंकुर प्रसाद, रामधार, बृजराज, शिवनाथ मिश्र, पारसनाथ मिश्र और शिवमूर्ति मिश्र, सत्यनारायण लल्लू पांडेय, श्रीराम श्रीवास्तव, राजाराम श्रीवास्तव, हरिबाबू श्रीवास्तव, आछैबर राम पांडेय, गिरीशचंद्र श्रीवास्तव, रामेश्वर प्रसाद मिश्र, अशोक चंद्र श्रीवास्तव, शेषमणि पांडेय, राजकुमार मिश्र सहित अनेक स्मृतिशेष विभूतियों की अहम भूमिका रही। बादपुर, चकडीहा, मिसिरताली, टिकरी, छेछुआ और डेंगुरपुर के ग्रामीणों ने भी सहयोग दिया।

मानस न्यूज-24 केवट मिलन की लीला का मंचन करते कलाकार


साज-सज्जा बदली, मंचन का उत्साह बरकरार

शुरुआती दौर में बांस-बल्ली खड़ी कर घरों की साड़ी और धोती से मंच सजाया जाता था। कलाकारों के लिए दफ्ती काटकर मुकुट तैयार किए जाते थे। रोशनी के लिए पहले मशाल और लालटेन, फिर गैस व पेट्रोमैक्स का इस्तेमाल हुआ। वर्ष 1971 में पहली बार मंच पर बिजली पहुंची तो ग्रामीणों में खासा उत्साह था।

पूर्व निदेशक अवधनारायण मिश्र के अनुसार, उस दौर से लेकर अब तक रामलीला का स्वरूप काफी बदल चुका है। वर्तमान में पक्की छत वाले रंगमंच पर रेशमी पर्दे, साइड की सजावट और झालरों की दूधिया रोशनी दिखाई देती है। दफ्ती के मुकुटों की जगह रंगीन कांच और प्लास्टिक से सजे मुकुटों ने ले ली है।

नौकरीपेशा लोग भी निभाते हैं रामायण के पात्र

महेवा कला की रामलीला की खासियत है कि इसमें गांव के लोग बिना पारिश्रमिक अभिनय करते हैं। रिटायर आईपीएस अधिकारी वागीश चंद्र मिश्र पहले रामलीला में पात्र निभाते थे। इलाहाबाद बैंक के सेवानिवृत्त एजीएम आशुतोष श्रीवास्तव और सेवानिवृत्त विद्युतकर्मी देवी प्रसाद वैश्य अब भी अभिनय करते हैं। अधिवक्ता आशीष श्रीवास्तव भी इसमें भूमिका निभाते हैं।

वर्तमान कलाकारों में गुलाब चंद्र पांडेय, पत्रकार संदीप मिश्र, अश्वनी श्रीवास्तव, शाश्वत श्रीवास्तव, सार्थक श्रीवास्तव, दिनेश पांडेय, मनोज वर्मा, अविनाश शर्मा, सोनू शर्मा, विंकित शर्मा, सुंदरम पांडेय, करन शर्मा और अंकित शर्मा सहित अन्य लोग शामिल हैं। हालिया मंचन में सुंदरम पांडेय ने राम, करन शर्मा ने लक्ष्मण, अंकित शर्मा ने सीता, देवी प्रसाद वैश्य ने दशरथ, अविनाश शर्मा ने कैकेयी और गुलाब पांडेय ने मंथरा की भूमिका निभाई।

मानस न्यूज-24 महेवा कला रामलीला में अस्थि समूह को देखते प्रभु श्रीराम

संवादों और प्रमुख लीलाओं से बनी अलग पहचान

धनुष यज्ञ, नककटैया, लंकादहन, लक्ष्मण शक्ति और अहिरावण वध रामलीला के प्रमुख आकर्षण हैं। धनुष यज्ञ में दुष्टराजा-साधुराजा, रावण-बाणासुर और परशुराम-लक्ष्मण संवाद खासे चर्चित रहते हैं। व्यास गद्दी और नृत्य प्रस्तुतियों के लिए बाहर से कलाकार बुलाए जाते हैं, जबकि अधिकांश पात्र गांव के लोग ही निभाते हैं।

रामलीला में आसपास के गांवों के हिंदुओं के साथ मुस्लिम और नट बिरादरी के लोग भी शामिल होते हैं। इस सहभागिता ने आयोजन को धार्मिक मंचन के साथ क्षेत्र की साझा सांस्कृतिक परंपरा का रूप दिया है।

बृहस्पतिवार रात भी राम राज्याभिषेक की घोषणा, मंथरा-कैकेयी संवाद, राम वनगमन और केवट मिलन का मंचन हुआ। कैकेयी के वरदान मांगने के बाद राम पिता के वचन की मर्यादा निभाने के लिए सीता और लक्ष्मण के साथ वन चले गए। गंगा तट पर केवट मिलन के दृश्य ने दर्शकों को भावुक कर दिया।

महेवा कला की रामलीला की यह यात्रा बताती है कि बदलते समय के साथ मंच और संसाधन आधुनिक हुए हैं, लेकिन गांव के लोगों का सहयोग, अभिनय के प्रति समर्पण और लोकआस्था आज भी इसकी असली पहचान हैं।

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