नई दिल्ली। अंटार्कटिका के ऊपर ओजोन परत में बने छिद्र का आकार इस साल असामान्य मौसमी परिस्थितियों के चलते काफी बढ़ गया। सितंबर और अक्तूबर के दौरान इसका औसत क्षेत्रफल लगभग 2.5 करोड़ वर्ग किलोमीटर दर्ज किया गया। वैज्ञानिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले 48 वर्षों के रिकॉर्ड में यह सातवां सबसे बड़ा ओजोन छिद्र है। 18 सितंबर को इसका विस्तार बढ़कर 2.71 करोड़ वर्ग किलोमीटर तक पहुंच गया था।
नासा और अमेरिकी राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन (नोआ) के वैज्ञानिकों के मुताबिक, इस बार ओजोन छिद्र के बड़े आकार के पीछे प्रदूषण फैलाने वाले रसायनों में अचानक हुई वृद्धि जिम्मेदार नहीं है। इसके बजाय अंटार्कटिका के ऊपर असामान्य रूप से कम तापमान और शक्तिशाली ध्रुवीय भंवर ने ओजोन परत के क्षरण की स्थिति को प्रभावित किया।
वैज्ञानिकों के अनुसार, ओजोन परत को नुकसान पहुंचाने वाले रसायनों का प्रभाव दशकों बाद भी बना हुआ है। रेफ्रिजरेटर और एयर कंडीशनर में इस्तेमाल होने वाले क्लोरोफ्लोरोकार्बन (सीएफसी) तथा ब्रोमीन युक्त रसायन इसके प्रमुख कारणों में शामिल हैं। इन रसायनों से निकलने वाले क्लोरीन और ब्रोमीन ओजोन के अणुओं को नष्ट करते हैं। इसका असर पृथ्वी के वायुमंडल में मौजूद ओजोन परत पर पड़ता है।
इस वर्ष 17 अक्तूबर को दक्षिणी ध्रुव के ऊपर ओजोन का स्तर घटकर महज 105 डॉबसन यूनिट रह गया। वैज्ञानिक मानकों के अनुसार, 220 डॉबसन यूनिट से नीचे ओजोन का स्तर होने पर उस क्षेत्र को ओजोन छिद्र की श्रेणी में रखा जाता है।
गौरतलब है कि अब तक का सबसे बड़ा ओजोन छिद्र सितंबर 2000 में दर्ज किया गया था। इस वर्ष का विस्तार उस ऐतिहासिक रिकॉर्ड से नीचे रहने के बावजूद पिछले करीब पांच दशकों के सबसे बड़े छिद्रों में शामिल हो गया है।
