जब माया के फेर में पड़े देवर्षि नारद, नहवाई में जीवंत हुआ नारद मोह का प्रसंग
कामदेव पर विजय के बाद नारद को हुआ अभिमान, स्वयंवर में नहीं मिली सफलता तो श्रीहरि को दे दिया श्राप
मांडा। नहवाई गांव में चल रही रामलीला में सोमवार रात नारद मोह की लीला का भावपूर्ण मंचन किया गया। कलाकारों ने देवर्षि नारद के अभिमान, माया और अंततः उनके मोहभंग की कथा को मंच पर प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया।
लीला के अनुसार कामदेव पर विजय प्राप्त करने के बाद देवर्षि नारद को अपनी शक्ति पर अभिमान हो गया। उनके इस अभिमान को दूर करने के लिए श्रीहरि ने अपनी माया से शीलनिधि नगर की रचना की। वहां राजा शीलनिधि की पुत्री मोहनी के स्वयंवर की तैयारी चल रही थी।
मोहनी की हस्तरेखा देखने के बाद नारद उसके रूप और स्वयंवर की ओर आकर्षित हो गए। माया के प्रभाव में उन्होंने क्षीरसागर पहुंचकर श्रीहरि से ऐसा रूप देने की इच्छा जताई, जिससे स्वयंवर में उन्हें सफलता मिल सके। श्रीहरि ने उन्हें बंदर का रूप दे दिया।
स्वयंवर में विश्वमोहिनी का वरण न कर पाने पर नारद बेहद आहत हुए। माया के प्रभाव में उन्होंने श्रीहरि को श्राप दे दिया। बाद में जब माया का प्रभाव समाप्त हुआ तो उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने श्रीहरि से क्षमा मांगी। इस प्रसंग के समापन पर पूरा रामलीला पंडाल श्रीहरि के जयकारों से गूंज उठा।
श्रीहरि के रूप में ओम तिवारी और लक्ष्मी उदित तिवारी, नारद के रूप में शिवशंकर, इंद्र के रूप में विकल्प तिवारी, शंकर के रूप में सत्य प्रकाश द्विवेदी, शीलनिधि के रूप में विष्णु शंकर द्विवेदी तथा ब्रह्मा के रूप में कृष्णाकांत तिवारी के अभिनय को दर्शकों ने खूब सराहा।

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